Tuesday, 22 September 2009

"वफाई के तख्त पे बैठो तो जानें, सचमुच में हो तुम मर्द ये हर शख्स पहचाने" -हमसफ़र से बेवफाई, ख़ुदा को भी नामंजूर ......(८ जून,२००१)



"गर मर्द हो निगाहों पे फिसलना कभी नहीं,


शबाब की समां में पिघलना कभी नहीं,



हुस्न के शोलों में जलना कभी नहीं,



आंखों के सुकून पे मचलना कभी नहीं,



दो पल की जवानी है ये ढल हीं जायेगी,



शामिल हुए तो क्या ये छोड़ जायेगी,



लौटोगे खाली हाथ फिर उस महबूबा के पास,



जो आज भी दिल से करती है तुझे प्यार,



तेरी निगाहों में ग़ैरत का असर होगा,



उसकी निगाहों में चाहत का बसर होगा,



कैसे हो तुम मर्द जो हर हाल में हारे हो,



हर पग पे बदले हीं सही औरत के सहारे हो



कहतीं हूँ अब भी मर्द का हिलना सिफ़त नहीं,



ग़ैरों के दम पे दुनिया में चलना कभी नहीं,



बनाया है जिसे हमसफर चलने को साथ में,


निभाना उसी का साथ तुम जीवन की राह में,



छोड़ उसे ग़ैर के संग जो चलोगे,



ख़ुदा से डरो उसकी नज़र में मुजरिम बनोगे,



कहते हो ख़ुद को मर्द तो इक राह पे चलो,



फ़र्ज़ की खातिर हर ख्वाहिश कलम करो,



वफाई के तख़्त पे बैठो तो जानें,



'सचमुच में हो तुम मर्द' - ये हर शख्स पहचाने !"

Friday, 11 September 2009

'फक्र करो अहम नहीं' -अहम से परेशां औरतों को मेरे लब्जों की इक ठंढी छुअन शायद कामयाब हो वरना खुदा की मर्जी.......(१७ जून, २००१)



"ऐ नाजनीन हुस्न पे , गुरूर मत करना



अदाओं के बर्क पे , बेखौफ मत चलना



तौफ़ीक तुझमें है , तक्कवूर नहीं करना



दौलत की बुलंदी पे, कभी नाज ना करना



जो खुशियाँ हैं मुकद्दर में , ये ना हों भी वो होंगीं


मग़र ग़म में पनाह लिखी , ये सब हों भी कम होंगी !"

Thursday, 13 August 2009

रहमदिल लोगों से मेरी इक इल्तज़ा..........(१५ अप्रैल, २००४)

"करो एहसां तो इक हद तक , ज़रा-सा बेरहम होना



मुकाबिल में है जो दम ख़म , ना भूले से उसे खोना


भले ही हैसियत तेरी , अर्श हीं चूमें

मगर जो फ़र्ज़ उसका है , उसे इन्कार मत करना


यही करते हैं अक्सर लोग , रहमदिल यूँ हो जातें हैं


कि सज़दे में खड़े फिर लोग , ओहदे में घुसे आतें हैं


अब हालात यूँ होता है , एहसां भुला जातें हैं


तारीफ में थकते ना लब, शिकवों में गुनगुनातें हैं


फिर खुन्नसों का आहिस्ता , इक दौर चलता है


अहम कि सीढियां चढ़-चढ़ , वही पाँव फिसलता है


तुम तक़दीर को अपना , गुनाहगार बतलाते हो


ख़ुद से हुई ख़ता जो , उसको भुला जाते हो


उस दिन जो बेरहम बने , सज़दे में छोड़ होते


हिम्मत ना थी हालात की , ये बेवफा होते !"

Wednesday, 12 August 2009

मेरे चहेते गीतकार "गुलज़ार (सम्पूर्ण सिंह) " के ७२वे जन्मदिन पे उनसे मेरी इक गुज़ारिश.........(१४ अगस्त, २००६)


"तेरे सोज(दर्द) की स्याही, जिस दिन ख़तम होगी

उस दिन मैं सोचूँगी, मेरी लिखावट भी गहरी है

हर लब्ज के कतरे में छिपा , गम का आशियाना

हमें जौहर सिखा 'सम्पूर्ण' , तेरी ये कैसी छड़ी है ! "

मुख्यमंत्री अच्युथानंदन को मेजर उन्नीकृष्णन के पिता की नाराजगी पे इक शब्द के प्रयोग का इक करारा ज़बाब...........!



"ओ मूर्ख ! निकले शब्द पे, कभी गौर भी तूने किया,





फरिश्ता -ए-वफा कहते उन्हें , जिन्हें गाली में तूने कहा





अब तेरे लिए जो कह रही , उनपे ज़रा तू गौर कर





तेरी समझ गाली थी जो , उस रूप में आ जाते हीं





वो दर खुला मिलता तुझे , हर दिल में समा जाते वहीं





सोचा तेरा क्या रूप था , वो शब्द भी ना तुझको मिला





ख़ुद को कहेगा क्या बता , उस दर पे जा मस्तक झुका !

Wednesday, 22 July 2009

नन्हा "अनय", मेरी सौगात ....... (१४ मई - १९ जून, २००९)



'माँ बनने के दौरान मेरे हर पल के एहसास ने मुझे बताया कि माँ की पीड़ा से कहीं ज्यादा उस नन्हे की पीड़ा होती है जो निर्लोभ ही माँ के गर्भ में परेशानियों को झेलता है और माँ के हर एक एहसास को अपना एहसास बना आपको "माँ" बनने का एक सुनहरा अवसर देता है !'




"नहीं एहसान मेरा तुझ पर ,


जो गर्भ में है तू पल रहा ?


कोई तुझसे भी ये पूछे ,


किस हाल में है तू चल रहा ?


वो शान किसी माँ का,


अब मुझे है खल रहा

जिसकी जुबाँ कहती रही -' नौ महीने रखा गर्भ में जो धरती पे तू है खड़ा '


मुझे भार है बस तेरा ,


तू है दबा किस नर्क में

चमड़ी की इक झिल्ली में ,


सिकुड़ा तू कैसे पल रहा ?

मैं मुडू जिस ओर,


उस ओर तू मुड़ता है

शैदाई बना मेरा ,

मेरी मर्जी से है तू चल रहा


नहीं पाक मेरा दामन ,


मुझे लोभ " माँ " बनने का

मासूम तू निर्लोभ ही ,


पीड़ा में है संभल रहा


हंसतीं हूँ मैं हंसता है तू ,


बूँदें गिरी रोता है तू

न जाने किस घड़ी संभालता है तू ?


मेरी परेशानियां , जलता है तू

ओ नन्हें मेरे ! तू कम नहीं


मुझे सहने का , 

तुझ में दम कहीं


कहेगी "माँ" ना अब कभी -----'देकर तुझे जीवन , एहसानों की की है बरसात ' 

 मैनें जन्मा तुझे ये कम ही है ,

 तूने "माँ" बनने की दी है सौगात !"


Wednesday, 10 June 2009

ईश्वर बल है.........(१७ जून, २००१)



"तू  बना रहबर मेरा , राहों का गम मैं क्यूँ करुँ



अंजुमन अपनी हुई , खिदमत का अलम क्यूँ करुँ



पास तू गम या खुशी , तन्हाईयों से क्यूँ डरूं


रज्जाक तू मेरा खुदा , निवालों का मातम क्यूँ करुँ ?"